प्रकृति का अंतिम संदेश

प्रकृति का अंतिम संदेश

हैरान है प्रकृति, इंसान की चाहत देखकर,
मानो सागर की असीम गहराई भी कम लगे।
अपनी इच्छाओं की दौड़ में ऐसा खोया मानव,
कि प्रकृति का अस्तित्व ही उसे धुंधला लगे।

असंख्य यातनाएँ और पीड़ा दे रहा है वह,
जिसकी गोद में पलकर बड़ा हुआ है।
प्रकृति पुकार उठी—
“रुक जा रे बंदे,
क्यों अपने ही विनाश की ओर बढ़ रहा है?”

अरे इंसान! तू केवल लेना जानता है, देना नहीं,
प्रकृति तो माँ के समान है,
जो निस्वार्थ भाव से केवल देना जानती है।

इंसान अपने शौक तो बढ़ाता गया,
पर अपना हृदय नहीं।
प्रकृति ने बहुत सहा उसके अत्याचारों को,
पर अब वह भी प्रतिकार कर रही है।

आज प्रकृति अपने रौद्र रूप में खड़ी है,
मानो मानव और ईश्वर के इस भीषण संग्राम में
 केवल इंसान के लालच के कारण।

समय ने ऐसा करवट बदली है,
कि इंसान हर चीज़ की कीमत चुका रहा है—
स्वच्छ वायु की, निर्मल जल की,
शुद्ध भोजन की, निरोगी काया की।

उसने केवल प्रकृति को ही दूषित नहीं किया,
रिश्तों में भी ईर्ष्या और स्वार्थ घोल दिया।
सब कुछ दिखावे का प्रतीत होता है,
मानो किसी असुर का मायाजाल हो।

और मेरे शिव और केशव,
इस विचित्र खेल को देखकर
मंद-मंद मुस्कुराते हैं।
देखते हैं इंसान का यह हाल,
जो अपने ही स्वार्थ की कठपुतली बन बैठा है।

तब त्रिदेव विचार करते हैं—
“क्यों हमने इंसान की रचना की?”
इंसान से तो पशु ही अच्छे हैं,
जो हमारी बनाई इस प्रकृति को
कभी कष्ट नहीं पहुँचाते।

निशांत गुप्ता

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