कौन सही?
कौन है सही—मैं या तुम?
क्या यह प्रश्न स्वयं में सही है?
छोटा-सा दिखने वाला यह प्रश्न,
क्यों बन जाता है इतनी बड़ी उलझन?
इसी प्रश्न से चर्चा आरंभ हुई,
कब बैठक सदन में बदल गई—पता न चला।
विपक्ष की भाँति तीखे व्यंग्य चले,
शब्द ऐसे, मानो संस्कृत में शास्त्रार्थ हो रहा हो,
मस्तिष्क पर असह्य भार पड़ गया।
एक क्षण को लगा—समर्पण कर दूँ,
पर मन ने कहा—चर्चा हो, भले ही निरर्थक सही।
किस्मत ने तब करवट ली,
हम दोनों मूल विषय से भटक गए,
जैसे राजनीतिक दल
देश के गंभीर मुद्दे छोड़
फिर उसी प्रश्न में उलझ जाएँ—
कौन है सही—मैं या तुम?
बचपन की सीख याद आई—
उत्तर कई बार प्रश्न में ही छुपा होता है,
बस आवश्यकता है
उसे सही अर्थ में समझने की।
हम दोनों ने दृष्टि बदली,
और सोचा—
इतनी बड़ी बात भी क्या है—
मैं या तुम?
दिल और दिमाग ने एक स्वर में कहा—
सबसे बड़ा सत्य है हमारा रिश्ता।
एक नई दिशा मिली,
और यह बोध हुआ—
अपने-अपने अस्तित्व से भी बड़ी बात है
एक-दूसरे का साथ।
तब मन में प्रश्न उठा—
क्या समाज और राजनीतिक दल भी
इस प्रश्न का उत्तर नहीं ढूँढ़ सकते?
“कौन है सही—मैं या तुम?”
में उलझने के बजाय,
क्या यह नहीं सोचना चाहिए—
सबसे बड़ी बात है हम?
सबसे सर्वोपरि है—
हमारा राष्ट्र,
जय हिंद।
निशांत गुप्ता
